Indian History reveal the Past

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2026-10-08

एंग्लो सिख विद्रोह

digital painting of anglo sikh war

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में पंजाब के एंग्लो सिख युद्ध के बारे में चर्चा की गई इस लेख प्रथम एंग्लो सिख युद्ध के साथ ही द्वितीय एंग्लो सिख युद्ध के बारे में भी चर्चा की गई इसके साथ ही युद्ध के मुख्य पात्र तथा युद्ध के मुख्य कारणों के बारे में भी चर्चा करेंगे। बताते चलें कि पंजाब का सिख साम्राज्य महाराजा रण जीत सिंह के समय काल में एक शक्तिशाली साम्राज्य था।

इनके जीते-जी अंग्रेजों की हिम्मत नहीं थी की पंजाब में अपना आधिपत्य स्थापित कर सकें वहीं जब इनका देहांत हुआ तभी से सिख साम्राज्य के पतन की कहानी प्रारम्भ होती है।

जब पहला एंग्लो-सिख युद्ध तो राजा दिलीप सिंह पंजाब की गद्दी पर असित थे जो कि एक बालक थे क्योंकि जब दिलीप सिंह गद्दी पर बैठे तो उनकी उम्र मात्र 5 वर्ष थी अतः उपरोक्त कारणों का फायदा उठाते हुए अंग्रेजों ने सिख सैनिकों को उकसाया जिसके परिणामस्वरूप पहला एंग्लो सिख युद्ध हुआ।

परिचय

सिख साम्राज्य के संस्थापक के रुप में महाराजा रणजीत सिंह को याद किया जाता है। उनका जन्म पाकिस्तान के गुजरवाला में 13 नवंबर 1780 में हुआ था। उनकी माता का नाम राजकौर था तथा पिता का नाम महासिंह जो कि सुकरचकिया मिसल के प्रमुख थे। इनका राज्य अभिषेक 1801 में हुआ था तथा इन्होंने अपनी राजधानी लहौर को 1799 में स्थापित कि तथा धार्मिक राजधानी अमृत सर थी।

1798-99 के समय काल में अफगान शासक जमाल शाह की 16 तोपें चिनाब नदी में गिर गईं थी जिसे महाराजा रणजीत सिंह ने निकलवा कर जमाल शाह को वापस कर दीं। जमाल शाल ने खुश हो कर उन्हें राजा की उपाधि प्रदान की तथा लाहौर को रियासत उन्हें सौंपी। खास बात यह की अभी तक रणजीत सिंह जी राजा नहीं बने थे इसके बाद ही 1801 में राज्य अभिषेक होने के बाद उन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

वे कश्मीर पेशावर लाहौर अमृतसर मुल्तान रावल पिंड़ी तथा अनंदपुर कि रियासतों के शासक थे। इतिहास के पन्नों पर यह पंजाब का स्वर्ण युग था। उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों के दौरान महाराजा रणजीत सिंह द्वारा पंजाब के सिख साम्राज्य का जब विस्तार किया जा रहा था उसी समय काल में ब्रिटिश नियंत्रित क्षेत्रों को विजय व विलय के माध्यम से पंजाब की सीमाओं तक बढ़ाया जा रहा था। 

राजा रणजीत सिंह जानते थे कि जल्द ही ब्रिटिश पंजाब में घुसने की कोशिश करेंगे। अतः महाराजा रणजीत सिंह ने अंग्रेजों के साथ सतर्क मित्रता की नीति अपनाई। जिसके चलते उन्होंने अंग्रेजों के साथ अमृतसर की संधि की।

अमृतसर की संधि

25 अप्रैल 1809 में अमृतसर की संधि हुई जिसके तहत सतलज नदी को सीमा बनाया गया जिसके तहत महाराजा रणजीत सिंह ने स्वीकार किया कि वे दक्षिण पूर्व की तरफ विस्तार नहीं करेंगे जिसके चलते मालवा पटियाला नाभा जींद की रियासत अंग्रेजों के अधीन चली गई। दूसरी तरफ अंग्रेजों ने वादा किया की वे उत्तर पश्चिम में रणजीत सिंह की रियासत में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेंगे।

हलांकि इस संधि के बाद भी रणजीत सिंह जानते थे कि अंग्रेजों पर विश्वास नहीं किया जा सकता जिसके चलते उन्होंने अपनी सेना का विस्तार किया। महाराज ने यूरोपीय सेना की तर्ज पर Napoleon Bonaparte की सेना कई पुराने आफीसर को अपनी सेना में शामिल कर फौजें-ए- खास नामक गुट की स्थापना की।

उन्होंने फ्रांस की सेना के सेनापति jean Francois Allard को तथा Cloude Augusete Court अपने तोप खानों को विकसित करने के लिए बुलाया वहीं पैदल सेना के लिए Jean Baptiste Ventura तथा Paolo Avitabile को बुलाया ताकी पैदल सेना को भी विकसित किया जा सके। फौजें-ए- खास  को  jean Francois Allard संचालित करते थे वहीं फौजे-ए-बेकवायद को Jean Baptiste Ventura संचालित करते थे।

बताते चलें कि 1814 में अफगान शासक शाह शुजा ने ही महाराजा रणजीत सिंह को कोहिनूर हिरा दिया था जो बाद में अंग्रेजों ने उनके साम्राज्य से छिन लिया था फिर यह हिरा रानी एलीजाबेथ के ताज में देखा गया था। 27 जून 1939 में महाराजा रणजीत सिंह की लहौर में मृत्यु हो गयी जिसके बाद से ही अंग्रेजों ने पंजाब पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिए षड्यंत्र रचना प्रारम्भ कर दिया था।

रणजीत सिंह के बाद के शासक

उनकी मौत के बाद उनके बडे़ बेटे माहाराजा खड़क सिंह राजगद्दी पर बैठे जिन्हें अफीम में जहर देकर मार डाला गया था 1840 में उनकी मौत हो गयी। इसके बाद कुंवर नौं निहास सिंह राजगद्दी पर बैठते जो की महाराजा रणजीत सिंह के पौते तथा खड़क सिंह के बेटे थे।

अपनी पिता का अंतिम संस्कार करने के बाद लौटते समय लाहौर किले के दरवाजे पर जिसे हज़ूरी बाग के दरवाज़े के नाम से भी जाना जाता है से टकराने से इनकी मौत हो गयी मगर इनकी मौत का कारण कुछ ओर ही था। इसके बाद कुछ समय के लिए महारानी चांद सिंह कौर राजगद्दी पर बैंठी जिन्होंने 1840 से 1841 तक प्रशासन का कार्य भार संभाला।

वे महाराज रणजीत सिंह की बहु थीं। इसके बाद महाराजा शेर सिंह गद्दी पर बैठे जिन्होंने 1841 से 1843 तक का कार्य भार संभाला। ये महाराजा रणजीत सिंह और महारानी मेहताब कौर के बेटे थे। और खड़क सिंह के सौतेले भाई थे। 1843 में संध्यावालीया सरदारों ने इनकी हत्या कर दी थी।

इसके बाद महाराजा दिलीप सिंह राजगद्दी पर बैठे जो कि महाराजा रणजीत सिंह के तथा महारानी जींद कौर के बेटे थे। वे मात्र 5 वर्ष की अल्प आयु में राजगद्दी पर बैठे जिस कारण से ज्यादातर प्रशासनिक कार्य उनकी माता यानी महारानी जींद कौर ने ही संभाला।

पहला एंग्लो-सिख युद्ध

यह युद्ध 1845 से 1846 के समय काल तक चला जिसके दौरान तीन युद्ध हुए। पहला युद्ध मुदकी का था दूसरा युद्ध फिरोजशाह का था तथा तीसरा युद्ध सबराओ का था। इस युद्ध की समाप्ति के बाद लाहौर की संधि हुई थी जिसमें गुलाब सिंह ने सिखों के साथ गद्दारी की थी जिसके चलते उसे 1 करोड़ रुपये में कश्मीर की रियासत दी गयी थी। खास बाद यह है कि इन्हीं के उत्तराधिकारी राजा हरी सिंह थे जो कि आगे चलकर कश्मीर क्षेत्र के शासक हुए।

मुदकी का युद्ध 

यह युद्ध 18 दिसंबर 1845 में सतलज नदी के किनारे हुआ जो की उस समय में फिरोजपुर के अंतर्गत आता था। दरअसल अमृतसर संधि के दौरान सिखों को सतलज नदी को पार करके अंग्रेजों के अधिग्रहण वाले क्षेत्र में नहीं जाना था मगर अंग्रेजों के उकसाने पर सिख सैनिक इस क्षेत्र में प्रवेश कर गये। अतः महाराजा रणजीत सिंह के साथ की गई अमृत सर की संधि इस घटना से टूट जाती है और अंग्रेजों द्वार इस युद्ध को अंजाम दिया जाता है।

दूसरी तरफ अंग्रेज इसी अवसर का इंतजार कर रहे थे। पहली सेना तेज सिंह की थी जिन्होंने सतलज नदी को पार करके फिरोजपुर की ब्रिटिश चौकी की तरफ बढ़ी तथा दूसरी सेना लाल सिंह के नेतृत्व में 18 दिसंबर की देर रात मुदकी के युद्ध में गौ और हार्डिंग ब्रिटिश सेना के साथ झड़प की। बिना योजना की इस लड़ाई में अंग्रेजों की जीत हुई।

फिरोज़ पुर का युद्ध

फिरोज़ पुर का युद्ध 21 दिसंबर 1845 में लड़ा गया। इस युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना अध्यक्ष गफ की सेना ने फिरोजपुर में सिखों के विशाल किला बंदी के पास पहुंची। गफ तुरंत हमला करना चाहते थे लेकिन हार्डिंग जो की उस समय गवर्नर जनरल थे ने उन्हें फिरोजपुर से आने वाली सिखों की टुकड़ियों का इंतजार करने को कहा।

जब सिख 21 दिसंबर को देर शाम को पहुंचे तब गफ ने दिन के कुछ बचे घण्टों में ही हमला कर दिया। सिखों के कुशल तोपखाने ने अंग्रेजों को भारी नुकसान पहुंचाया तथा सिख पैदल सेना ने बहादुरी से लड़ी। दूसरी तरफ सिख की घुड़सवार सेना कुलीन सैनिक अंग्रेजों की पैदल सेना तथा घुड़सवार सेना के लिए अप्रभावी निकले। क्योंकि लाल सिंह ने उन्हें युद्ध के मैदान से दूर रखा था।

शाम होते-होते गफ की सेना के कुछ सैनिक सिखों के ठिकानों तक पहुँचने में सफल रहे लेकिन बाकी टुकड़ियाँ थकने के कारण पीछे हट गईं। हार्डिंग को अगले दिन हार की आशंका थी जिसके चलते उसने मुदकी में मौजूद सरकारी दस्तावेजों को जलाने का आदेश दिया था। हलांकि अगली सुबह ब्रिटिश और बंगला की टुकड़ियाँ एकजुट हुईं और सिखों को उनके किले में खदेड़ने में सफल रहीं। दूसरी तरफ लाल सिंह ने अपनी सेना को पुनः एकत्रित करने का प्रयास नहीं किया।

इसी बीच तेज सिंह की सेना वहां आ पहुंची एक बार फिर से युद्ध प्रारम्भ हुआ लेकिन अंग्रेजों की थकी सेना को देखकर उन्होंने युद्ध के दौरान घोषणा की कि ब्रिटिश  सेना पीछे हट रही है जबकि ऐसा नहीं था ब्रिटिश सेना के घुड़सवार और तोपखाना वास्तव में घेराबंदी कर रहे थे। इस बीच  ब्रिटिश सेना के थके होने के कारण उन्हें आराम की जरूरत जिसके कारण वे अस्थायी रुप से रुक गए।

बद्दोवाल का युद्ध

यह युद्ध 21 जनवरी 1846 को लड़ा गया था जिसे  देसा सिंह मजीठिया जो कि महाराजा रणजीत सिंह के अधीन सबसे योग्य मंत्रियों में से एक थे उन्हीं के रणजोद सिंह मजीठिया बेटे थे। उन्होंने विशाल सेना का गठन किया जिसमें 10000 पैदल सैनिक और साठ तोपों सहित कुछ नियमित घुड़सवार सैनिक शामिल थे।

उन्होंने बड़ी संख्या के साथ सतलज नदी को पार किया यहां से लाडवा के अजीत सिंह ने भी उनका साथ दिया और उनके साथ शामिल हो गए। वे सभी लुधियाना की और बढ़े और ब्रिटिश छावनी के एक हिस्से को जला दिया। लुधियाना को राहत देने के लिए भेजे गए सर हैरी स्मिथ , फिरोजपुर से पूर्व की और बढ़े और सतलज से कुछ मील की दूरी बनाए रखी।

सिख सेना की ताकत  का पता लगाने पर तथा गफ के आदेश पर स्मिथ ने अपनी सेना को जगराओं के रास्ते आगे बढ़ाया और वहां से एक ब्रिटिश रेजिमेंट को अपने साथ लेकर सिख सेना की मुख्य टुकड़ी से पहले लुधियाना पहुंच गए। 21 जनवरी को जब वे बद्दोवाल से निकले तो सिख अनियमित घुड़सवार सेना ने लगातार उनकी पिछली टुकड़ियों पर हमला किया।

उन्होंने स्मिथ के अधिकांश सामान ढोने वाले जानवरों को पकड़ लिया और पीछे छूटे हुए सैनिकों को मार गिराया। फिर भी थकी-हारी हालत में लुधियाना पहुँचने में सफल रहे। दिल्ली से सैनिकों की एक  ब्रिगेड जिसमें दो गोरखा बटालियन शामिल थीं उन्होंने उसकी मदद की।

अलीवाल का युद्ध

28 जनवरी 1846 को यह युद्ध लड़ा गया था अपनी सेना को आराम देने के बाद स्मिथ एक बार फिर बद्दोवाल की ओर आगे बढ़े सिख सतलज नदी के किनारे अवीवाल में शरण लिए हुए थे और अतिरिक्त सैनिक की प्रतीक्षा कर रहे थे। 28 जनवरी को स्मिथ ने पहले ही सावधानी बरतते हुए सिखों पर हमला कर दिया। जिसके चलते उसे शानदार जीत हासिल हुई।रणजोद सिंह मजीठिया की सभी तोपों को तथा उनकी सेना को जब्त कर लिया गया।

सोब्राओन की लड़ाई

सोबराओन की लड़ाई 10 फरवरी 1846 को लड़ी गई थी। सिख

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